ट्रांसजेंडर होनेका मेरा व्यक्तिगत अनुभव

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नेपाल सम्बत १११९ पाँचवा महिना ‘चिल्ला’ १९ अर्थात् १९९९ मार्च ४ के दिन मेरे घरमैं सबसे बड़ा बालकके रूपमैं जन्म लिया। सबसे बड़ा बच्चा और सबसे बड़ा नाति ।

मैं मेरा मेरे मा बाप, चाचा चाची, दादा दादी और बड़ा परिवारमैं बडी हुई थी। मैने नेपालके नेपाः घाटी(जिसको काठमान्डू घाटी भी कहेती है)के नैटिभ नेवाः जातीके परिवार मैं जन्म लिया था। हमारे यहाँ ‘मचा बू ब्याङ्केगु’ नामका एक परम्परा होता है जिसमैं बच्चेका नाम रख्खा जाता है। उन दोरान मेरे बुआ(हम निनि कहते हैं) ने मेरा नाम ‘क्रोजन कपाली’ रख्दिया। और मैं जब दो सालकी हुवी तब मुझे इडेन गार्डेन बोर्डिङ स्कुलमैं दाखिला कियागया था।

मुझे याद है, मैं जब छोटी ही थी, तभीसे मुझे जो लड्कियां कर्ती थी, मैं वह कर्ती थी। मुझसे आठ महिनें बडी एक कजन दीदी भी थी। मुझे उसके साथ बडी होनेका मौका मिला। जब मेरी मा मेक अप कर्थी थी, मुझे भी वो कर्ना अच्छा लग्था था। मैं भी कर्ती थी। मुझे जबसे मालुम हे, याद है, मैं खुदको कभी लड्के की तह्रा नही देखती थी। मुझे मेरी स्कुलकी महिला शिक्षक जो थी, वह फेसिनेटिङ लगते थे। जब मैं स्कुलसे घर लौट्ती थी तब मैं उनकी हि तरहा एक्ट कर्ती थी। मैं मेरे निनि(बुआ)की हील जुत्तीयां पेहनकर मेरे बज्ये(दादी)की साडी पहनकर नाच्तीथी। श्रावणका महिना चलता था तो सब लड्कियां मेहेन्दी लगाते थे। उसे हम ‘लैंचा’ बोल्ते हैं। ‘यह काम तो लड्के नहीं करते है’ सभी मुझे एसा बोल्ते थे। पर मैं तो रोकर भी यह कर्ती थी।

हमारे संस्कृतिमैं कोही लड्का जब १२/१३ सालका होता है तो उसे ‘कयेतापुजा’ कर्ते है। यह एक परम्परा है। हमारे यहाँ सबसे पेहेले बाल काट्ने वाला व्यक्ति पाजु होता है, यानेके मामा। यिसी लिए मेरे बाल भी नहीँ कट्वाए गए। मुझे याद हे मैं विभिन्न तरहसे बाल बाँधती थी, उसे हम ‘सतबत चीगु’ कहते है। पर बहुत लोगोंको यह हजम नहीँ होता था। वह उनकी मूकी अभिव्यक्तिसे पता चल्ता था।

जबमैं कक्षा २मैं पहुंची, तब मेरे शिक्षकों ने मुझे बाल काट्नेको काहा। क्योंकी लम्बे बाल वाले लड्के अनुशासित नहीँ माना जाता था। अब शिक्षक ने कहा तो मान्ना पडा।

कक्षा ५

जैसे सब बच्चे बडे होरहे थे, मैं भी वेसे ही बडी होरही थी। मैं ने खुदके बारेमैं उतना ध्यान नही दिया था। एक दिन मेरे एक दोस्त ने मुझसे काहा, “अरे, तू तो लड्की की तरह चल्ती है, कम्मर हिलाके”। मैं ने उस बखत उतना ध्यान नही दिया उसकी बात पर। कक्षामैं शादीके बारेमैं भी बातचीत होती थी। मुझे याद है एक बार मुझसे कहा गया था मुझे तो बडी होकर एक लड्कीके साथ शादी कर्के अच्छा पती बन्ना है। जब मैं ने वह बात कल्पना कर्नी शुरु की थी, मुझे बहुत बेआराम मेहसुस हुआ था। ‘नहीँ पर एसा क्यों?’ मुझे वेसा लगता था। जब मैं खुदको एक लड्की और पत्नीके रूपमैं कल्पना कर्ती थी, तब हाँ मुझे बहुत की सहज अनुभव होता था।

कक्षा ६

मैं पहली बार कोशोरावस्था मै प्रवेश कर्ने जा रही थी। इस दोरान कक्षा मैं लोग लैङ्गिकताके आधार पर अलग होना सुरु कर रहे थे। इससे पहले तो कौन लड्का कौन लड्की, किसीको भी मतलब नहीं था। अब लड्के अलग और लड्कीयां अलग बैठना सुरु कररहे थे। शायद सामाजिक परिवेशके कारण। मुझे तो लड्कीयों की साथ ही बैठना मन कर्ता था। पर वह सभी मुझे यह कहते थे की ‘तुम तो लड्के हो, लड्कों के साथ बैठो।’ मुझे लड्कोंके साथ बैठना उत्ना अच्छा नही लगता था। सहज मसुस नही कर्ती थी।

मेरे दोस्तों ने मुझे ‘फरक तरह’ नोटिस कर्ना सुरु किया। ‘यह तो लड्की जैसा बात कर्ती है’ बोल्ते थे। जब वह लोग मुझे बोल्ते थे के मैं जो भी कर्ती हुँ लड्कीयों के तरहा कर्ती हुँ तो मनमैं एक डर सा छागया। उस बखत सिरियल देख्ना भी लड्कियोंका काम माना जाता था।

कक्षा ७

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मैं खुदको ढूंढरही थी। मैं दूसरों से फरक हूँ, यह तो पता चल छुका था। मैं लड्कियों कि तरहा बर्ताव कर्ती थी, यह मालुम चला था। दूसरे बच्चे जो बालकके रूपमैं पैदा हुवे थे, उनसे भिन्न थी, यह पता चलछुका था। अगर मैं ने कुछ बोला या कुछ किया उसी वक्त लोग मुझपे कमेन्ट कर्ते थे, ‘अरे, यह तो लड्कीके तरह कर्ता है’। इस कारण मेरे मनमैं उदासी छाने लगा। मैं कामोमैं निरुत्साहित होती गई। अगर मैं बोल्ती तो फिरसे ताना मार्ते, तो चुप ही बैठना पसन्द होने लगा। दूस्रोंके आगे चली तो फिरसे ताना मार्ते थे इसि लिए बाहार जाना, ज्यादा लोगोंके सामनेसे चल्ना भी कम कर्ती गई। मुझे अन्दरसे घुटन मेहसुस होता था। इसी लिए, मैं तो बहुत ही लड्के कि हरहा हुँ, यह जताने के लिए मैं ने नाटक कर्ना सुरु किया। मैं मेरे लड्के दोस्तोंको देख्ती थी और उनके जैसा हि कर्ने की कोशिस कर्ती थी। जो बातें स्टीरोटाइप पुरुष करते थे अगर मैं ने वहसा हि किया तोह मुझे कोही ताना नही मारेगा यह सोचती थी। मेरा तो गर्लफ्रेण्ड भी है, यह जताना सुरु कर्दिया था।

मुझे लोग ‘छक्का हिज्रा’ बुलाने लगे। नेपालके ज्यादातर पहाडी समाजों मैं यह बहुत ही अपमानजनक शब्द है। मैं तो धीरे धीरे लोगों के सामने प्रस्तुत होनेकी अत्मबल भी गुमाने लगी थी। ‘मैं एसा क्यों हुँ?’, ‘यह मुझे हो क्या रहा है’, एसे प्रश्न मनमैं आने लगे। लोग मुझे ‘गे’ कहकर भी बुलाते थे। (वास्तव मैं नेपाली समाजको गे(होमोसेक्सुअल) और पारलैङ्गिक(ट्रांसजेण्डर) मैं फरक है, यह बात नही मालुम।) मैं ने अपना ज्यादातर समय यही सोचकर बिताए के कैसे मैं यह तानाबाजी लाञ्छना से छुट्कारा पाऊं। मेरा सारा ध्यान खुदको इन तानोसें बचाने पर चलागया। इस कारण मेरे मन मैं मानसिक तनाव भी सुरु होगया था। यस शायद ही गैर-ट्रांसजेण्डर लोग नहीँ समझ पाएंगे।

कक्षा ८

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कोशोरावस्था मैं पहुँचा। शारिरिक और भावनात्मक परिवर्तन आने शुरु होगए। यौन भावना क्या है, उत्तेजित होना क्या है, यह बातें समझ पर आगई थी। जब मेरे चेहरे पर बाल आने लगे, मतलब दाढ़ी, तब मुझे बहुत असहज मेहसुस हुआ। उसके बाद आवाज़ बदल्ना और शारिरिक बद्लावसे असहज मेहसुस कर रही थी। लगता था के अन्दरसे मैं जो हुँ वो बहार से नहीँ हुँ। यस शरीर और अन्तरात्मा का नामिल्ना खटक रहा था।

मैं ने अप्नी लैङ्गिकता और यौनिकता के बारेमैं जानना सुरु कर्दिया था। उस बखत एक चर्चित ऐक्टर ‘सन्तोष पन्तका बेटा अब बेटी बनी’ जैसी शीर्षक मैं समाचार भाइरल होने लगी। वही समाचार पढ्कर मैं ‘ट्रांसजेंडर’ शब्दसे परिचित हुई। जब मैं ने इस बारेमैं गुगल करना सुरु कर्दिया था। उसके बाद बुझे एलजिबिटीआइ के बारेमैं मालुम हुआ। पारलैङ्गितका, समयौनिकता, इन सबके बारेमैं मालुम होने लगा। मैं ने एसे ही लैङ्गिकता और यौनिकता के विषयमैं खुदको ज्ञान देती गई। शायद यह सब खोज्ते हुए मैं ने साइबर क्याफेमैं बहुत पैसे खर्च किए।

एसे विषयमैं बातें ही नहीं होती थी तो जान्ने का माध्यम ही इन्टरनेट बना।

सबसे महत्वपूर्ण बात जब मुझे यह आभास हुआ की मुझे लड्के पसन्द हैं। इस बातको मैं शब्दों मैं बयान नहीं कर सक्ती। वह अनुभव ही विचित्रका था, भिन्न था, आकर्षणका। मैं ने पोर्न देख्ना भी सुरु किया था। ट्रांसजेंडर पोर्न खोजके देख्ती थी। इससे भी बहुत कुछ जाननेको मिला। इस बारेमैं मैं ने कुछ सहपाठीयों को बताई। उनहे इससे घिन आया और मुह बिगाड्ने लगे। मेरे एक सहपाठी गरिमाको पता था एलजिबिटीआइ के बारेमैं।

फेसबुक पर एक फेक अकाउन्ट खोला। मैं नें लड्कीके कपडे चुपकर खरिदा और उसे कम्ब्रेमैं छुपाकर भी रखा था। अप्ना यौनिकता एक्स्प्लोर करनेका उम्र भी था। उस वक्त उस अकाउन्ट पर होने वाली अत्याधिक कामुक बातें मुझे अच्छी नहीँ लगी तो मैं ने अकाउन्ट डिलिट कर्दिया।

कक्षा ९

चिढ़ाना, धौंसियाना, लैङ्गिकता पर आधारित अपमान, यह सब मेरे लिए बहुत ही ज्यादा होरहा था। मुझ्से यह सब सेहेन नहीँ हुआ तो मैं ने कक्षा मैं सबके आगे बोला ‘हाँ, मैं ट्रांसजेंडर हुँ, ह्वाट ड फक डु यु ह्याब प्रबलम’ कहकर चिल्लाया। इसके बाद तो और ज्यादा संघर्ष कर्ना पडा। मैं अप्ने लैङ्गिक पहिचानके खातिर खडा हुई। अब तो स्कुल मेरे लिए जहनुम की तरह होछुकी थी। हमेसा झगडे होना, लोगोंका धौंसियाना, मुझे चिढ़ाना, अपमान, बेइज्जती, यह तो रोजीरोटी की तरह हो गया था। मुझे स्कुल से परिशानी होने लगी। आत्महत्या का भी खयाल आया। मैं खुदको दूसरों से दूर रख्ने लगी। कभी मुझपे पानी डाल्ते थे, कभी डस्टर से मारते थे। कभी टिफिन के बचेकुचे फेकते थे। मैं अकेली एक कोने पर पडी रहती थी। पर फिर भी मेरे पेर पकड कर खीचते थे। मौखिक दुर्व्यवहार बहुत होती थी।

इन्टरनेट के माध्यम से मैं ने नील हिरा समाज नामक एक संस्था मैं सम्पर्क किया और दूसरे एलजिबिटी लोगों से मिली। मैं ज्यादातर वहाँ नहीं जाती थी। मुझे सिर्फ स्कुलके परिशानी से छुट्कारा पाना था। मैं स्कुल मैं बहुत एब्सेन्ट होने लगी। थोरा तो मज़ा ही था पर उससे ज्यादा डर, भय, घृणा और बुलिङ।

कक्षा ९ के अन्तिम पर मैं ने फेसबुक मार्फत पोस्ट लिखकर अप्ने बारे मैं बता दिया। मेरे रिश्तेदारों ने फोन पर नकरात्मक टिप्पणी दी। यह नाटक कर रहा है, यह अप्राकृतिक है, एसा वाला दोष भी दिए। जब दूसरे हमारे बारे मैं कुछ बुराभला बोल्ते है, तब खास कुछ मेहसुस नही होता, पर जब अप्ना ही हमको बुराभला बोल्ते है, तब मन दुख्ता है। मेरे मा बाप फेसबुक पर नहीं थे तो यह बात पता नहीं चली।

मैं ने कक्षा ८ होते हुए कुछ लड्कीके कपडे खरीदे थे। मेरे बाज्या(दादा)की जन्मदीन पर उसे पहनने का निर्णय लिया। मैं ने पहनी और अपने कम्ब्रे से बाहर निक्ला। मेरे बाज्या बज्ये(दादा दादी)के घर मेरेसे ४ घर उधर है। मैं ने ज्यादा कुछ नहीं सोचा और निकल लिया। पहले तो पडोसी, घर परिवार और रिश्तेदार बातें करने लगे। हर दिन बुरी बातें खरीखोटी सुन्ने को मिला। पर धीरे धीरे परिवार मैं हालात सुधरने लगे। पर स्कुल मैं बिगड्दा गया। मेरा सबसे ज्यादा बुलिङ करने वाले तो मेरे प्रिन्सिपल निकले। उनके संकीर्ण मानसिकताके कारण मुझे स्कुल मैं बहुत परिशानी और कष्ट हुवा। मुझे ना स्कर्ट पहनने दिया ना ही बाल लम्बे कर्ने।

ज्यादातर लोग यह कहते है कि, ‘टांसजेंडर महिलायें बच्चे पैदा नहीं कर सकते, शादी नहीं होगा और परिवार भी।” मुझे उस वक्त यह जवाफ देनेका मन था के, “तुम लोगोंको तो यौनिकता की विविधताके बारे मैं मालुम नही है। ट्रांसजेंडर पर आकर्षित होने वाले लोग भी होते है। समस्या यह है के समाज हमे स्वीकार नहीं करते। तो कैसे लोग खुलकर सम्बन्ध रखेंगे?” समस्या यह है के हमारे शादी को मान्यता नहीं मिली है। हम गर्भवती नहीं हो सकते, पर क्या यह जरूरी है? हम अपने हिसाब से ही बच्चे पैदा कर सकते है। हमरे समाज मैं जो महिला मां नहीं बन सकती या नहीं बनना चाहती, उन पर लगाया जाने वाले लाञ्छना और विभेद को तोड्ना चाहिये। हम अभिभावक बगेरके बच्चोंको गोद लेसकते है। दूसरे महिलाओं के तरह हम भी अच्छे मा बन सकते है। खैर, बच्चा होने से या ना होने से किसीके भी जिन्दगीका वर्थ नहीं नापा जाता। इस धारणाको चुनौती देना चाहिये।

कक्षा १० और जब मैं ने अपने बारे मैं सब को बताया

कक्षा ९ के दोरान जब मैं ने घरवालों को यह बात बताया था तोह बहुत झगड़ा और बहस हुवा। मेरे स्कुल के प्रिन्सिपल ने मुझको यह बोला कि अगर मैं ने स्कर्ट पहनी या बाल लम्बे किये तो मुझे स्कुल से निकाल देंगे। मुझे ना सिर्फ गालियाँ दी पर मारा भी। प्रिन्सिपल की तानाशाही स्वभाव के कारण स्कुल बहुत ही मुश्किल हुवा। मैं कितनी डरी डरी थी, मुझे कितना नाइन्साफी हुवा, मैं यह शब्दों मैं बयान नही कर सकती। एक बार प्रिन्सिपल ने मुझे आँफिस पर बुलाके मानिस यातनायेँ दी, “यह मेरा स्कुल है। यहाँ मेरी मर्जी चलती हौ। मेरे पार पूरा अधिकार है। तुम स्कुल से निकाल फेक दियाजा सकता है। तुम एसएलसी नहीं दे पाओगे।’ मुझे भावनात्मक धम्कीयां देता था। उनहों ने एक बार मुझे रसते पर स्कर्ट लगाकर जाते हुवे देखा, उसके दूसरे दिन स्कुल मैं बहुत बुरी तरा डाँदा और मारे भी।

मेरी छोटी से छोटी गल्ती पर भी डाँटा करते थे, और डाँट डाँट कर घुमा फिरा कर मेरे लैङ्गिकता पर बात लेजाते थे और उस पर आधारित गालियां देकर मारते थे। मेरे कुछ दोस्त तो थे जो मुझसे कमसेकम “नफ्रत” ही तो नहीं करते थे। मुझे स्कुलके उस चंगुलसे जल्द ही उक्त होना था। कब एस.एल.सी. दूंगी और स्कुलसे छुट्कारा मिलेगा यह ही मन मैं सुझता था। मेरे लिए स्कुल तो एक जेल बनछुका था, एक हिट्लर जेलरके साथ।

दूसरी तरफ मेरा परिवार था। मेरे रिश्तेदारों ने मुख़ालिफ़ किया। उनकी घृणा उनके लब्जों से जाहेर होता था। यह सभी घटना लिखर भी काफी नहीं है। किसी ने बोला इसको एक महिने के लिए खाना ना खिलाकर रखो, किसी ने कहा इसे एक महिने तक हात पैर बाँधकर कम्ब्रे मैं बन्द करो। घृणावाचना की सीमा ही नहीं रही। मैं ने सामाजिक संजाल पर पोष्ट करना निरन्तर किया।

रश्ते पर चल्ना भी मुश्किल था। लोग हँस्ते थे, पीछे से दोडकर आगे एक कोनेसे मुड्कर एक झलक देख्ते थे। रश्ते पर एक कमेडी पात्र की तरह होगयी थी। राहचल्ते लोग हँस्ते थे। घृणाके टिप्पणी सुन्नेको मिल्ता था। कुछ लड्कों ने तो मुझे उंगलि दिखाकर भी बोला, “चल् इस इन्सानकी जिप्पर खोल्देते है, कौन करसकता के, वो सिकन्दर।” रश्ते पर चलना तो जाहनुम जैसा होचला था। जिन्दगीका हर मोड कांटोंकी तरह चुभ्ने लगा था। कुछ हद तक यह आज भी होता है। कभीकबार तो गुस्सा भी आता है, उनको पीट ना दूं।

मैं गरव के साथ सर खडा करके घर जाती थी, पर जब अप्ने घरके सुरक्षित घेरामैं पहुँचती तब कटुता और तिरस्कारके आँशु बहते थे।

सम्झाने के दोरान

मेरी मा मुझे बहुत प्यार कर्ती थी इसी लिए सुरु मैं ही समझ गई। पापाको सम्झाने मैं वकत लगा। सुरुवाती दिनों मैं पापाके साथ मुश्किल भी था। पर उनहे सम्झाने के लिए मुझे खास कुछ नहीं करना पडा। मेरे पापाका एक टेलर दुकान है। वहाँ आने वाले ग्राहकके साथ इस बारे मैं बातें होती थी। उसी तरह की बातों से कन्भिन्स होने लगे। मेरे कुछ पडिसियों ने भी पापाको सकरात्मक रूपसे सम्झाया।

इस प्रकारकी सामाजिक परिवेशमे पले बडे मेरे मा बापको धक्का मेहसुस होना स्वभाविक था। पर जैसे वह लोग समझ्ते गए और अपनाते गए, वह महत्वपूण बात है।

मैं ने मम्मी से बात करकर हर्मोन पिल्स सेवन कर्ना सुरु करदिया था। उससे मेरे शारीरिक आकृति भी फेमिनाइन होते चलागया। शायद जब मैं कक्षा ७ के दोरान लाञ्छना के डर से नाटक कर रही थी, उसके वजह से भी ज्यादातर लोगों को यह लगा की मैं पहले एसी नहीं थी। पर उनहें मेरे मनकी बातें क्या पता।

कक्षा १० के बाद

एस.एल.सी. के बाद स्कुल नामक जेल से मुक्त हुवी। मैं ने बाल लम्बे करना सुरु करदि थी। मुझे जिस तरह की कपडें पसन्द है, वही लगाना सुरु करदी थी। हर्मोन पिल्स के कारण शारिरिक रूपसे भी सिस्-महिला कि तरह ही दिखने लगी। फेसबुकके मार्फत् कुछ बोइफ्रेंड भी बने, कामियाब नही हुवा। कुछ उदासपन इसके कारण भी था। और भूकम्प भी उसी साल आया।

सेक्स वर्कर कहकर सामान्यीकरण करना

सब ट्रांसजेंडर महिलायें सेक्स वर्कर है कहकर सामान्यकरण करने के कारण अच्छा अनुभव नहीं रहा। ज्यादतर जब रश्ते पर चल्ती थी, खासकर थोडी अँधेरा होना सुरु होजाए, तब कुछ लड्के “कितने लोगी” एसा वाला सवाल कर्ते थे। सुरु सुरु मैं डर लगता था। बादमैं उनपर चिल्लाने लगी। आजकल एक झलक देख्ने से ही ‘यह तो एक ट्रांसजेंडर है’ तो नहीं ठेहरा सकते, इसी लिए पेहले जैसा नहीं होता ज्यादातर। सामान्य मानिसकता पर ट्रांशजेंडर महिलायें वस्तुकरण होते है। यौनिक या कामुक होना बुरी बात है, यह मैं नही मानती, पर सभी ट्रांसजेंडरों को सामान्यकरण करना गलत है।

ज्यादातर फेसबुक पर वह लड्के हो खुदको ‘मैं ट्रांसजेंडर महिला पर आकर्षित हूं’ कहते है, वह लोग दुर्व्यवहार करते है। कभी कबार यह निराशा भी लाती है।

कक्षा ११, १२

मेरे मा बाप और मैं जिल्ला प्रशासन कार्यालय जाकर मेरे लैंगिक पहिचान के आधार मैं नागरिकता लिई। उस वकत मेरे पापाको समस्या तो नहीं थी पर पूरी तरिके से अपनाया नहीं था। मैं लगंख्यः पर स्थित एक कलेज एम्स एकेडेमि पर दाखिला हुई। उस वकत नेपाल मैं कक्षा १० तक ही स्कुल थी और कक्षा ११ से कलेज बोल्ते थे। मैं ह्यूमानिटिज फ्याँकल्टी पर दाखिला हुई। जब मैं ने वहाँकी प्रिन्सिपलको आप्ने लैङ्गिकता के बारे मैं बताई तोह उनहों ने बहुत ही सकरात्मक रूपसे लिया और मुझे वहाँ किसी प्रकारकी भेदभाव नहीं होगी, इस बातकी तसल्ली दिलाया। मैं ११, १२ कक्षाके दोरान किसीको भी यह खुलकर नही बताया कि मैं ट्रांसजेंडर हूं, क्यों की स्कुल मैं जो भुगती वह फिरसे कलेज मैं नहीं भुगतना चाहती थी।

अब

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मैं भविष्यमैं भाषाविद बनना चाहती हूं। अब एक्टिभिजम् मैं भी संलग्न हूं। अब भी बहुत कुछ परिवर्तन नहीं हुआ है। पर यह बात है कि मैं अपने लिए बोल सकती हूँ, अपना आवाज उठासकती हूँ और मेरे समर्थन मैं लोग है, यही मेरी तागत है।

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